राखी के तिहार
राखी के तिहार ************** सुन्ना होगे मोर घर अँगना ,सुन्ना होगे मोर दुवारी। एसो के राखी में भइया ,कइसे सजाहू तोर बर थारी।। देखत रेहेंव रस्ता तोरे , मोर भइया हा आही। आ के अपन कलाई म , मोर से राखी बन्धवाही।। किसम किसम के मिठाई अउ , मेवा ल खवाहू। दीपक अउ टिका ल , थारी में सुग्घर सजाहू।। मन ह मोर उदास होगे , सुन्ना होगे मोर दुवारी। एसो के राखी में भइया , कइसे सजाहू तोर बार थारी।। जब ले आहे कोरोना ह , कुछु तिहार बने नई लागत। अतेक दिन तो होगे संगी , बीमारी काबर नई भागत।। सिट्ठा सिट्ठा लागत तिहार , मजा नइ आवत हे। रोटी पिठा चीला सोहारी , कुछु नइ भावत हे।। काबर नइ आवत हस भइया , एसो के राखी म। रास्ता देखत देखत भर गे , पानी मोर आँखी म।। मन मोर उदास होगे , सुन्ना होगे मोर दुवारी। एसो के राखी मे भइया , कइसे सजाहू तोर बर थारी।। प्रिया देवांगन "प्रियू" पंडरिया छत्तीसगढ़