राखी के तिहार
राखी के तिहार
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सुन्ना होगे मोर घर अँगना ,सुन्ना होगे मोर दुवारी।
एसो के राखी में भइया ,कइसे सजाहू तोर बर थारी।।
देखत रेहेंव रस्ता तोरे , मोर भइया हा आही।
आ के अपन कलाई म , मोर से राखी बन्धवाही।।
किसम किसम के मिठाई अउ , मेवा ल खवाहू।
दीपक अउ टिका ल , थारी में सुग्घर सजाहू।।
मन ह मोर उदास होगे , सुन्ना होगे मोर दुवारी।
एसो के राखी में भइया , कइसे सजाहू तोर बार थारी।।
जब ले आहे कोरोना ह , कुछु तिहार बने नई लागत।
अतेक दिन तो होगे संगी , बीमारी काबर नई भागत।।
सिट्ठा सिट्ठा लागत तिहार , मजा नइ आवत हे।
रोटी पिठा चीला सोहारी , कुछु नइ भावत हे।।
काबर नइ आवत हस भइया , एसो के राखी म।
रास्ता देखत देखत भर गे , पानी मोर आँखी म।।
मन मोर उदास होगे , सुन्ना होगे मोर दुवारी।
एसो के राखी मे भइया , कइसे सजाहू तोर बर थारी।।
प्रिया देवांगन "प्रियू"
पंडरिया
छत्तीसगढ़

बहुत बढ़िया कविता
ReplyDeleteवाह वाह बहुत सुन्दर
Deleteवाह वाह बहुत खूब ,
ReplyDeleteThank you
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